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Saturday, April 17, 2021

फेसबुक ने अक्षय ऊर्जा खरीदने के लिए क्लीनमैक्स से की साझेदारी

 नयी दिल्ली। फेसबुक ने संवहनीयता उपायों के तहत भारत में शत प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने के लिए क्लीनमैक्स के साथ साझेदारी की है। कंपनी ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि समझौते के तहत फेसबुक और क्लीनमैक्स, पवन तथा सौर परियोजनाएं तैयार करेंगे, जो भारत के बिजली ग्रिड को अक्षय ऊर्जा की आपूर्ति करेगा।

बयान के मुताबिक, ‘‘फेसबुक और क्लीनमैक्स ने आज भारत में फेसबुक के संवहनीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक साझेदारी की घोषणा की, जिसके तहत क्लीनमैक्स के पवन और सौर ऊर्जा संयंत्रों से बिजली की आपूर्ति की जाएगी।

बयान में कहा गया कि इस समझौते के तहत कर्नाटक में स्थित 32 मेगावाट की पवन परियोजना को चालू किया जाएगा। इस समझौते के तहत क्लीनमैक्स के पास परियोजनाओं का स्वामित्व होगा और वह संचालन करेगी, जबकि फेसबुक आने वाले वर्षों में परियोजना से मिले 100 प्रतिशत पर्यावरणीय विशेषता प्रमाणपत्र  को खरीदने के लिए प्रतिबद्ध होकर दीर्घकालिक समर्थन देगा।

फेसबुक में नवीकरणीय ऊर्जा की प्रमुख उर्वी पारेख ने कहा, हम इस महत्वपूर्ण कदम की घोषणा से उत्साहित है जो भारत सहित इस क्षेत्र में हमें अपने परिचालन को 100 प्रतिशत नवीकरण ऊर्जा पर आधारित करने में मदद करेगा।

गोबर से लिपे मिट्टी के मकान-रैबासा होमस्टे

भारत, उत्तराखण्ड (पौड़ी) — कल्जीखाल ब्लॉक के सांगुणा गांव के रहने वाले 85 वर्षीय किसान विद्यादत्त शर्मा ने क्षेत्र को रैबासा की नई सौगात दे दी है। विद्यादत्त शर्मा बीते 54 सालों से लघु उद्यम व हर्बल गार्डन के माध्यम से स्थानीय लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

कृषि और बागवानी के प्रति उनके लगाव होने के चलते उन पर मोतीबाग नाम से एक लघु फिल्म भी बनाई गई थी, जो ऑस्कर के लिए भी नामित हुई थी। वहीं, अब तक के प्रयासों के बाद उन्होंने अपने गांव में ही पहाड़ की शैली से निर्मित एक होमस्टे का निर्माण कर दिया है।

इसे रैबासा का नाम दिया गया है। विद्यादत्त शर्मा बताते हैं कि उन्होंने सरकारी नौकरी त्याग कर अपने पसीने से खेतों को सींचकर इन्हें कृषि योग्य बनाया है। वह युवाओं को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं कि गांव में कृषि, बागवानी और पर्यटन के क्षेत्र में काम कर पलायन को रोकने और अपने गांव को फिर से आबाद करने का काम करें।

विद्यादत्त शर्मा के बेटे त्रिभुवन उनियाल बताते हैं कि पहाड़ की शैली से बनने वाले घर धीरे-धीरे लुप्त हो गए हैं। उनका संरक्षण करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही यहां जो भी पारंपरिक रूप से कार्य किए जाते हैं उसे पर्यटक व अन्य लोग भी सीख सकें और उसे आने वाली पीढ़ी को भी सौंप सकें।

रैबासा होमस्टे की शुरूआत का मुख्य उद्देश्य यही है। त्रिभुवन उनियाल कहते हैं कि उनके पिता की उम्र काफी अधिक है। बावजूद उनका अपने गांव के प्रति प्रेम और जज्बा ही उन्हें लगातार कृषि, बागवानी, मौन पालन और विभिन्न कार्यों के लिए प्रोत्साहित करता है।

वह लंबे समय से जल संरक्षण पर भी कार्य कर रहे हैं। अधिक उम्र के बावजूद भी उनका इतनी मेहनत कर अपने गांव को खुशहाल बनाना अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।

Vidya-Dutt-Sharma 









भारत से अपनी दुकान क्यों समेट रहा सिटी बैंक

प्रमुख अमेरिकी बैंक “सिटी बैंक” का भारत में अपना कारोबार समेटने का फैसला कुछ गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आखिरकार क्यों विदेशी बैंकों के भारत में पैर उखड़ रहे हैं? इनके लिए भारत क्यों कठिन काम करने का स्थान साबित हो रहा है, वो भी कारोबार करने के लिहाज से ?


सिटी बैंक ने कहा कि ग्लोबल स्ट्रैटजी के हिस्से के रूप में वह भारत में अपना कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस बंद करने जा रहा है। 1985 में सिटी बैंक ने भारत में कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस शुरू किया था।

अगर पीछे मुड़कर देखें तो पता चलता है कि बैंक आफ अमेरिका ने 1998 में, एएनजे ग्रिंडलेज बैंक ने 2000 में, एबीएन ऐमरो बैंक ने 2007 में, ड्यूश बैंक ने 2011 में, आईएनजी ने 2014, आबीएस ने 2015 में अपने भारत के कारोबार को या तो कम किया या बंद कर दिया। एचएसबीसी ने 2016 में अपने कामकाज बंद तो नहीं किया पर अपनी शाखाओं की तादाद को बहुत ही कम कर दिया।

विदेशी बैंकों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि यह सिर्फ मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरू, कोलकता, चैन्नई जैसे महानगरों और अहमदाबाद, गुरुग्राम, चंडीगढ़, इंदौर जैसे बड़े नगरों और शहरों में कार्यरत रहकर ही अपने लिए मोटे मुनाफे की उम्मीद करते हैं। ये गिनती भर की शाखाएं ही खोलते हैं।

ये सोचते है कि एटीएम खोलने भर से बात बन जाएगी। ये एटीएम को शाखा के विकल्प के रूप में देखते हैं। यह सोच बिल्कुल सही नहीं है। इन्हें समझ ही नहीं आता कि आम हिन्दुस्तानी को बैंक में जाकर बैंक कर्मी से अपनी पास बुक या एफडी पॉलिसी को अपडेट करवाने में ही आनंद मिलता है। वहां पर उसे बैंक की नई स्कीमों के बारे में भी पता चलता है।

बैंकिग सेक्टर को जानने वाले जानते हैं कि जो बैंक जितनी नई शाखाएं खोलता है, वह उतना ही जनता के बीच में या कहें कि अपने ग्राहकों के पास पहुंच जाता है। स्टेट बैंक और एचडीएफसी बैंक की राजधानी के व्यावसायिक हब, कनॉट प्लेस इलाके में ही लगभग 10-10 शाखाएं कार्यरत हैं।

इसी तरह से कई प्रमुख भारतीय बैंक भारत के छोटे-छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में फैले हुये हैं। एचडीएफसी, कोटक महेंद्रा बैंक, आईसीआईसीआई बैंक तो प्राइवेट बैंक हैं। फिर भी इन्हें पता है कि ये उसी स्थिति में आगे जाएंगे जब ये भारत के सभी हिस्सो में अपनी शाखाएं या एटीएम खोलेंगे। ये इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

आप बता दीजिए कि क्या किसी विदेशी बैंक ने बिहार के किसान को ट्रैक्टर खरीदने या आंध्र प्रदेश के युवा उद्यमी को अपना कारोबार चालू करने के लिए लोन दिया? क्या किसी को याद है कि एएनजे ग्रिंडलेज बैंक, एबीएन ऐमरो बैंक, ड्यूश बैंक, आईएनजी या आरबीएस ने कभी झारखंड के ग्रामीण इलाकों, छतीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों या फिर उड़ीसा के सुदूर इलाकों में अपनी कोई शाखा खोली हो ?

अगर नहीं खोली तो क्यों नहीं खोली? क्या इनके लिए भारत का मतलब सिर्फ चंद-एक गिनती भर के शहर हैं। यह तो कोई बात नहीं हुई। इन्हें भारत में अपना कारोबार करने का अधिकार है। इन्हें यह भी अधिकार है कि ये भारत में कारोबार करके मुनाफा भी कमाएं। आखिर इन्होंने निवेश भी किया होता है। पर इन्हें सिर्फ और सिर्फ मुनाफे को लेकर नहीं सोचना चाहिए।

कहने दें कि ये विदेशी बैंक तो मोटी जेबों वालों के लिए ही अपनी आकर्षक सेवाएं लेकर आते हैं। इनके टारगेट वे ग्राहक पढ़े लिखे आधुनिक नौजवान भी होते हैं जो मोटी सैलरी पर नौकरी कर रहे होते हैं। सिटी बैंक कंज्यूमर बैंकिंग बिजनेस में क्रेडिट कार्ड्स, रीटेल बैंकिंग, होम लोन जैसी सेवाएं दे रहा था।

इस समय भारत में सिटी बैंक की 35 शाखाएं हैं। गौर करें कि सिर्फ 35 शाखाओं के साथ चल रहे “सिटी बैंक” को वित्त वर्ष 2019-20 में 4,912 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था जो इससे पूर्व के वित्त वर्ष में 4,185 करोड़ रुपये था।

देखिए कि भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सर्वोच्च बैंकिंग नियामक अथॉरिटी है। आरबीआई देश में बैंकिंग व्यवस्था के लिए नियम बनाता है और देश की मौद्रिक नीति के बारे में फैसले लेता है। भारत के बैंकिंग क्षेत्र में पांच तरह के बैंक काम करते हैं। ये हैं निजी क्षेत्र के बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक, ग्रामीण बैंक और कोआपरेटिव बैंक।

अगर बात प्राइवेट क्षेत्र के बैंकों से शुरू करें तो हमारे प्रमुख प्राइवेट बैंक हैं; एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडसइंड बैंक और एक्सिस बैंक आदि। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उन्हें कहा जाता है जिनमें मेजर हिस्सेदारी (51%) सरकार के पास होती है। इनमें पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया एवं अन्य कॉमर्सियल बैंक आदि आते हैं।

अब बात करते हैं विदेशी बैंकों की। भारत के लिए विदेशी बैंक दो प्रकार के होते हैं। पहले, वे बैंक जो भारत में अपनी ब्रांच खोलते हैं और दूसरे वे बैंक जो भारत में अपनी प्रतिनिधि बैंकों की शाखा के माध्यम से बिज़नेस करते हैं। इन बैंकों में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस और सिटी बैंक आदि आते हैं। इनके अलावा, भारत में विभिन्न ग्रामीण बैंक और कोआपरेटिव बैंक अर्बन कोआपरेटिव बैंक सहित भी सक्रिय हैं। इनकी ग्राहक संख्या भी लाखों में है।

एक बिन्दु पर साफ राय रखने की जरूरत है कि उन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज के स्तर को बहुत बेहतर करने की जरूरत है जिन्हें हम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कहते हैं। इनकी स्थिति से तो सारा देश वाकिफ है। देखिए कि बैंकिंग अपने आप में आम जनता से जुड़े हुए सेवा का क्षेत्र है। यह सेवा क्षेत्र में ही आता है। अबकि अब ऐसा नहीं है और सेवा के नाम पर यहां भी सेवा शुल्क की वसूली शुरू हो चुकी है। अब सेवा के नाम पर एक भी कार्य ऐसा नहीं बचा है, जो बगैर शुल्क के किाया जाता हो।

यहां पर तो वही बैंक आगे जाएगा जो अपने ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं देगा, जिसकी अधिक से अधिक शाखाएं होंगी, उसके अफसर और बाकी स्टाफ अपने ग्राहकों के हितों का ध्यान रखेंगे। कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक तो इसलिए ही जनता के बीच जमे हुए हैं, क्योंकि, उन्हें भारत सरकार से भी मोटा बिजनेस मिल जाता है। अगर सरकार उन्हें अपने रहमो करम पर छोड़ दे तो ये पानी भी न मांगे।

देखिए भारत का बाजार अपने आप में अनंत सागर की तरह है। इसमें सबके लिए काम करके जगह बनाने और कमाने के पर्याप्त अवसर हैं। पर भारत के बाजार में वही बैंक टिकेंगे जो ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं और जिनकी उपस्थिति महानगरों से लेकर गांवों-कस्बों तक में होगी।

राज किशोर सिन्हा

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तम्भकार और पूर्व सांसद हैं।)

Saturday, January 30, 2021

बिलों पर मोदी बनाते थे दबाव: अंसारी



भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपनी आत्मकथा बाय मैनी अ हैप्पी एक्सीडेंट में दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन पर हंगामे के बीच राज्यसभा में बिलों को पारित करने का दबाव डाला था। अंसारी के मुताबिक उन्होंने हंगामे के बीच किसी भी बिल को पारित करने से इनकार किया था।

अंसारी ने किताब में लिखा है कि एक दिन अचानक पीएम मोदी उनके कमरे में आ गए। सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता कि कोई पीएम बिना किसी कार्यक्रम के ऐसे सभापति से मिले। लेकिन पीएम पहुंचे और बोले कि सभापति के रूप में उनकी यह भूमिका की कोई भी बिल हंगामे में पारित नहीं होगा] राज्यसभा से बिल पारित कराने में अड़चन पैदा कर रहा है।

उन्होंने कहा कि आप से बड़ी जिम्मेदारियों की अपेक्षा है, लेकिन आप मेरी मदद नहीं कर रहे हैं। अंसारी ने इस किताब में लिखा है कि एनडीए को ऐसा लगा कि लोकसभा में उसका बहुमत उसे राज्यसभा के नियमों को दरकिनार करने का नैतिक अधिकार देता है। अपनी किताब में अंसारी ने कहा है कि उन्होंने बतौर राज्यसभा के सभापति, निर्णय लिया था कि वह कोई भी विधेयक हंगामे और शोर-शराबे में पारित नहीं होने देंगे।

Monday, January 25, 2021

भारतीय गणतंत्र दिवस पर इतिहास की अजूबी किसान ट्रैक्टर रैली

विश्व की यह पहली किसान क्रान्ति है जिसका किसान आंदोलन के रूप में आज 61वां दिन है। मंगलवार यानी 26 जनवरी 2021 को जब किसान आंदोलन अपने 62वें दिन में प्रवेश करेगें तो विश्व पटल पर एक नया इतिहास रचा जायेगा। एक तरफ जहां पारंपरिक रूप से राजपथ पर परेड निकलेगी तो वहीं दूसरी तरफ किसान ट्रैक्टर रैली का एक विहंगम दृश्य अवलोकित होगा जो निश्चित रूप से एक ऐसा इतिहास लिखेगा जो अबतक की सारी क्रान्तियों को पीछे छोड़ देगा। 




पिछले दो महीने से किसान भारत की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर आनन-फानन में लाये गये तीन नए कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। लगभग एक दर्जन दौर की बातचीत सरकार और किसानों के बीच हो चुकी है। लेकिन नतीजा ढ़ाक के तीन पात बराबर ही है। किसान जहां नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं तो वहीं सरकार वापस लेने की बजाय संशोधन पर ही जोर दे रही है।

बहरहाल विश्वभर की निगाहें भारत में होने वाली कल की ट्रैक्टर रैली पर टिकी हैं। दिल्ली पुलिस के इस खुलासे के बाद कि पाकिस्तान से ट्रैक्टर परेड के दौरान हिंसा भड़काने की कोशिश हो रही है। सुरक्षा व्यवस्था सख्त कर दी गई है। दिल्ली पुलिस के अनुसार, 13 से 18 जनवरी के बीच दिल्ली पुलिस की खुफिया शाखा ने पाकिस्तान से संचालित हो रहे 308 ट्विटर हैंडिल की पहचान की है। इनके जरिए किसान आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने की साजिश रची जा रही थी। यह खुलासा दिल्ली पुलिस इंटेलिजेंस के स्पेशल कमिश्नर दीपेंद्र पाठक ने किया है।




संयुक्त किसान मोर्चा की प्रेस रिलीज

दिल्ली पुलिस के इस खुलासे के बाद किसान संगठन भी सतर्क हो गए हैं और उन्होंने रैली में शामिल होने के लिए एक गाइडलान जारी की है। संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से योगेंद्र यादव ने परेड से संबंधित जानकारियां साझा की हैं। उसके अनुसार, परेड में ट्रैक्टर और दूसरी गाड़ियां चलेंगी, लेकिन ट्रॉली नहीं जाएगी। जिन ट्रालियों में विशेष झांकी बनी होगी, उन्हें छूट दी जा सकती है। मोर्चा ने परेड में शामिल होने के इच्छुक लोगों के लिए एक नंबर भी जारी किया है, जिस पर मिस्ड कॉल देने पर व्यक्ति परेड में शामिल हो सकता है।

24 घंटे का रखना होगा राशन-पानी

साथ ही परेड में शामिल लोगों को अपने साथ 24 घंटे का राशन-पानी का इंतजाम भी करने को कहा गया है, ताकि जाम में फंसने पर किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। हर ट्रैक्टर या गाड़ी पर किसान संगठन के झंडे के साथ-साथ राष्ट्रीय झंडा भी लगाया जाए। ट्रैक्टर या परेड में किसी भी राजनीतिक पार्टी का झंडा नहीं लगेगा। साथ ही लोगों को किसी भी तरह हथियार रखने और भड़काऊ नारा लगाने से भी परहेज करने को कहा गया है।

जरूरी सूचना: किसान गणतंत्र परेड में इन राज्यों से दिल्ली आए जो किसान अपने राज्य की झांकी में हिस्सा लेना चाहते हैं वो तुरंत संपर्क करें।

राज्य: हिमाचल, गुजरात, गोवा, तमिलनाडु, तेलंगाना, छत्तीसगढ़,झारखंड, बिहार, सिक्किम, मेघालय, मणिपुर,मिजोरम, नागालैंड,अरुणाचल

संपर्क: 9872890401 pic.twitter.com/iDtwbxZyma

— Yogendra Yadav (@_YogendraYadav) January 24, 2021

परेड के दौरान हिदायतें

मोर्चा ने परेड के दौरान की हिदायत जारी करते हुए कहा है कि परेड की शुरुआत किसान नेताओं की गाड़ी से होगी। उनसे पहले कोई ट्रैक्टर या गाड़ी रवाना नहीं होगी। वहीं परेड में शामिल सभी को हरे रंग की जैकेट पहने ट्रैफिक वॉलिंटियर की हर हिदायत को मानना ही पड़ेगा।

सभी गाड़ियां तय रूट पर ही चलेंगी, जो गाड़ी रूट से बाहर जाने की कोशिश करेगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अगर कोई गाड़ी सड़क पर बिना कारण रुकने या रास्ते में डेरा जमाने की कोशिश करती है, तो वॉलंटियर उन्हें हटाएंगे। एक ट्रैक्टर पर ज्यादा से ज्यादा ड्राइवर समेत पांच लोग सवार होंगे। बोनट, बंपर या छत पर कोई नहीं बैठेगा। ट्रैक्टर में कोई अपना ऑडियो डेक नहीं बजाएगा। परेड में किसी भी किस्म के नशे की मनाही रहेगी। साथ ही औरतों की इज्जत करनी होगी और सड़क पर कचरा फेंकना मना होगा।

इमरजेंसी की हिदायतें

परेड के दौरान किसी भी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए भी मोर्चे की तरफ से कुछ हिदायतें जारी की गई हैं, जिसके अनुसार लोगों को अफवाह से बचने और सूचना की प्रामाणिकता जांचने की सलाह दी गई है। परेड में एंबुलेंस की व्यवस्था भी रहेगी।

जरूरी सूचना: किसान गणतंत्र परेड में इन राज्यों से दिल्ली आए जो किसान अपने राज्य की झांकी में हिस्सा लेना चाहते हैं वो तुरंत संपर्क करें।

राज्य: हिमाचल, गुजरात, गोवा, तमिलनाडु, तेलंगाना, छत्तीसगढ़,झारखंड, बिहार, सिक्किम, मेघालय, मणिपुर,मिजोरम, नागालैंड,अरुणाचल

संपर्क: 9872890401 pic.twitter.com/iDtwbxZyma

— Yogendra Yadav (@_YogendraYadav) January 24, 2021

किसी भी तरह की मेडिकल इमरजेंसी होने पर हेल्पलाइन नंबर या नजदीकी वालंटियर से संपर्क करने की सलाह दी गई है। ट्रैक्टर या गाड़ी खराब होने की स्थिति में उसे बिल्कुल साइड में लगाया जाएगा और किसी भी तरह की वारदात होने पर पुलिस से संपर्क करने की सलाह दी गई है।

ट्रैक्टरों की संख्या से जुड़े सवाल के जवाब में स्पेशल कमिश्नर दीपेंद्र पाठक ने बताया कि अभी ट्रैक्टरों की संख्या का पता नहीं चल पाया। मौजूदा समय में दिल्ली के चारों प्रदर्शन स्थल पर लगभग 10 से 12 हजार ट्रैक्टर मौजूद हैं। अभी कुछ ट्रैक्टरों के आने की भी सूचना है तो ऐसे में हम उम्मीद लगा रहे हैं कि 14 से 15 हजार ट्रैक्टर किसान परेड में शामिल होंगे। किसानों के ट्रैक्टर परेड के दौरान परेड का दिल्ली में 100 किलोमीटर से ज्यादा का रूट होगा। इन सभी मार्गों पर दिल्ली पुलिस द्वारा सुरक्षा के विशेष इंतजाम भी किए जाएंगे।

किसान संगठनों का दावा

ट्रैक्टर रैली के बारे में किसान यूनियन के सदस्य जसवंत सिंह ने बताया कि 26 तारीख को अलग-अलग राज्यों से लगभग 30 लाख ट्रैक्टर दिल्ली पहुंचेंगे। इसमें 1 लाख ट्रैक्टर पंजाब से, 1.5 लाख ट्रैक्टर हरियाणा से, 50 हजार ट्रैक्टर यूपी से, 50 हजार ट्रैक्टर राजस्थान से, 25 हजार ट्रैक्टर उत्तराखंड से आ रहे हैं। इसके अलावा 50 हजार ट्रैक्टर बिहार और अन्य कई राज्यों से भी आ रहे हैं। इसमें मध्य प्रदेश, केरल और गुजरात आदि राज्य शामिल हैं। इस ट्रैक्टर रैली में 3 करोड़ किसान शामिल होंगे जो सरकार को अपनी एकता का सुबुत देंगे।



निकलेंगी झांकियां

आंदोलनकारी किसानों की 'गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड' में विभिन्न राज्यों की कई झांकियां होंगी जो ग्रामीण जीवन, केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के साथ ही आंदोलनकारियों के साहस को दर्शाएंगी। यह जानकारी आयोजकों ने दी। एक किसान नेता ने बताया कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले सभी संगठनों को परेड के लिए झांकी तैयार करने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने कहा, देशभर से लगभग एक लाख ट्रैक्टर-ट्रॉलियां परेड में शामिल होंगी। इनमें से लगभग 30 प्रतिशत पर विभिन्न विषयों पर झांकियां होंगी, जिसमें भारत में किसान आंदोलन का इतिहास, महिला किसानों की भूमिका और विभिन्न राज्यों में खेती के अपनाये जाने वाले तरीके शामिल होंगे।

भ्रष्टाचार से घिरे नेतन्याहू

इजराइल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ साप्ताहिक प्रदर्शन क लिए यरूशलम में हजारों लोग जमा हुए और उनसे इस्तीफे की मांग की। इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी चौराहों और पुलों पर कई छोटे-छोटे प्रदर्शन भी हुए।



नेतन्याहू पर धोखाधड़ी, विश्वासघात और तीन मामलों में रिश्वत लेने के आरोप लग रहे हैं। ये मामले उनके अरबपति सहयोगीयों और मीडिया के क्षेत्र के दिग्गजों से जुड़े हैं। लगभग यही हालात भारत के भी हैं, यहॉं तो ऐसी मीडिया को गोदी मीडिया के नाम से पहचान मिल गई है। इसे अब पहचान का संकट नहीं रहा।

इससे इतर नेतन्याहू इन सभी आरोपों से इंकार करते हैं और ऐसा सभी करते ही हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आरोप के साथ वह उचित तरीके से देश का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं। पिछले साल गर्मी के मौसम से ही प्रत्येक सप्ताह इन प्रदर्शनों का आयोजन किया जा रहा है। खास तौर पर यरूशलम के एक चौराहे पर नेतन्याहू के आधिकारिक आवास के निकट विरोध प्रदर्शन का आयोजन होता है।

सर्दी के मौसम में भले ही इसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या कम हुई हो लेकिन प्रदर्शन जारी रहा। इजराइल में दो वर्ष की भीतर मार्च में चौथी बार चुनाव होंगे और प्रधानमंत्री को अपनी लिकुड पार्टी (A centre-right political party in Israel ) के भीतर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।


Monday, January 15, 2018

CJI रहित संविधान पीठ को न्याय की दरकार


भारत  की जनता के लिए  गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीषों को अपनी बात कहने के लिए देश की मीडिया के सामने आना पड़ा?

Justice J Chelameswar and three other senior Supreme Court judges had held a press conference.


देखा जाये तो न्यायिक इतिहास की यह अभूतपूर्व घटना साबित होगी। भारत में न्यायपालिका और विशेषकर उच्चतम न्यायालय एक ऐसा संस्थान है, जिसपर भारत का जनमानस बहुत अधिक विश्वास करता है। जब पीड़ित हर तरफ से न्याय की उम्मीद छोड़ चुका होता है तो यही संस्थान जिसे न्यायालय कहा जाता है, उसके उम्मीद की एक किरण होती है।
उम्मीद की यही किरण उसे अधीनस्थ न्यायालय से उच्चतम न्यायालय लाती है कि न्याय के अंतिम पायदान पर तो उसे न्याय नसीब होगा ही। जबकि बहुत से वरिष्ठ वकीलों से मैंने सुना है कि न्यायलय में न्याय नहीं जजमेन्ट मिलता है।


अदालत के सामने एक केस होता है, जिस पर न्यायालय दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाता है।  पेश किये गये तथ्यों, उस पर दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कानून में नीहित प्राविधानों के मद्देनजर, अदालत जजमेन्ट देती है। अब किसको न्याय मिला नहीं मिला ये सब गौण हैं।
चारों जजों ने अपने को मीडिया के समक्ष पेश किया और अपनी बात रखी, इसलिए यह कोई केस तो हुआ नहीं कि इस पर अदालत फैसला दे। यहॉं तो बात न्याय की है और वो भी इन जजों को मिलता है कि नहीं, ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।
शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीषों द्वारा पता नहीं किस मजबूरी में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाना पड़ा और एक संयुक्त पत्र जारी कर देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीष पर न्यायसम्मत तरीके से कार्य न करने की बात कहनी पड़ी।
उन्होंने मुख्य न्यायाधीष के प्रशासनिक अधिकार की ओर उंगली उठाते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीष अपने इस अधिकार का सही इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। उन चारों का कहना रहा कि अगर हम आज उच्चतम न्यायालय की मौजूदा स्थिति के खिलाफ न खड़े होते तो अब से 20 साल बाद समाज के कुछ बुद्धिमान व्यक्ति यह कहते कि हम चार जजों ने ‘अपनी आत्मा बेच’ दी थी।
इन चारों न्यायाधीषों ने यह भी बयान किया कि हम इस मामले में चीफ जस्टिस के पास गए थे, लेकिन वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा। ये भी बड़ा गंभीर विषय है कि उच्चतम न्यायालय के ही चार वरिष्ठ न्यायाधीषों की बात मुख्य न्यायाधीष ने नहीं सुनी।
इस प्रेस कांफ्रेंस को संपन्न हुए पांच मिनट भी नहीं हुए थे कि कई वरिष्ठ वकीलों ने पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क देने शुरू कर दिए। वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया में आकर मुख्य न्यायाधीष के कथित चहेते जजों का नाम और वे मामले जो उन्हें सौंपे गए, बताना शुरू कर दिया तो पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर0एस0 सोढ़ी ने इन चार जजों के कदम को उच्चतम न्यायालय की गरिमा गिराने वाला, हास्यास्पद और बचकाना करार दिया।
वकील के0टी0एस0 तुलसी और इंदिरा जयसिंह ने चार जजों का पक्ष लिया तो पूर्व अटार्नी जनरल एवं वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी ने चार जजों की ओर से प्रेस कांफ्रेंस करने पर घोर निराशा जताई। चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के औचित्य-अनौचित्य को लेकर तरह-तरह के तर्कों के बाद आम जनता के लिए यह समझना कठिन हो गया कि यह सब क्यों हुआ और इसके क्या परिणाम होंगे?
उसके मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिरकार उच्चतम न्यायालय में क्या चल रहा है? इन सवालों का चाहे जो जवाब हो, लेकिन पहली नजर में यही लगता है कि एक विश्वसनीय संस्थान व्यक्तिगत अहंकार या कहिए वर्चस्व की जंग का शिकार हो गया है।
जब प्रेस कांफ्रेंस में चार न्यायाधीषों से पूछा गया कि क्या वे मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग लाने के पक्षधर हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि यह समाज को तय करना है। इसका सीधा और साफ मतलब यही निकलता है कि उच्चतम न्यायालय के ये चारों जज मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग चलाये जाने के पक्ष में हैैं?
ज्ञात हो कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों को, मात्र महाभियोग लगाकर ही हटाया जा सकता है। और यह बहुत ही कठिन प्रक्रिया है।
भारत में उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीषों की पीठ को संविधान पीठ का दर्जा मिला हुआ है और उसके फैसलों में कानून की ताकत होती है। आपने अभी तक कभी-कभार ही केंद्रीय बार काउंसिल और राज्य बार एसोसिएशनों द्वारा जजों के खिलाफ व्यक्तिगत मामलों में आरोप लगते हुए देखा-सुना होगा?
लेकिन पिछले 70 सालों में एक बार भी ऐसा देखने को नहीं मिला होगा कि उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ जज अपने मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करें और वह भी केसों के आवंटन में कथित पक्षपात को लेकर। इन चार जजों का कहना है कि कौन केस किस बेंच के पास जाएगा, यह तो मुख्य न्यायाधीष के अधिकार क्षेत्र में है।

लेकिन यह प्रक्रिया भी कुछ संस्थापित परंपराओं के अनुरूप चलाई जाती है। सामान प्रकृति के मामले सामान बेंच को जाते हैं। और यह निर्धारण, मामलों की प्रकृति के आधार पर होता है, ना कि केस के आधार पर।

कुछ विद्वानों का मत है कि अगर यह तरीका कारगर नहीं हुआ जैसा कि जजों द्वारा संकेत किया गया है तो फिर ये जज मुख्य न्यायाधीष की केस आवंटन प्रक्रिया के खिलाफ स्वयं संज्ञान लेते हुए फैसला दे सकते थे। ऐसा कोई फैसला स्वत: सार्वजनिक होता और कम से कम उससे यह ध्वनि न निकलती कि सार्वजनिक तौर पर कुछ जज मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ सड़क पर आ गए हैैं।
कैसी-कैसी हास्यास्पद बातें की जा रही हैं। यदि ऐसा कुछ इन चार जजों में से किसी के भी द्वारा ऐसा किया जाता तो तब पूरा देश उन्हें कटघरे में खड़ा करता कि अगर उन्हें मुख्य न्यायाधीष की कार्यप्रणाली से कोई शिकायत थी तो वे कहीं उचित फोरम पर अपनी बात रखते? स्वंय मुख्य न्यायाधीष के एक्शन के खिलाफ स्यो-मोटो फैसला लेना कहॉं तक उचित था।

प्रेस के सामने आना कोई गुनाह नहीं होना चाहिए,और गुनाह होता भी नहीं है। इस देश में हर व्यक्ति न्याय पाने के लिए अपनी बात कहीं भी और विशेषतौर पर मीडिया के सामने रखने के लिए स्वतंत्र है। और विशेषतौर पर मीडिया के समक्ष रखना ही उसे ज्यादा आसान दिखाई देता है।  
इस देश के आम नागरिक से लेकर, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, छोटे से अधिकारी से लेकर बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स तक, एवं विपक्षी पार्टीयों से लेकर मुख्य न्यायाधीष तक प्रेस के सामने आये ही हैं।

फिर ऐसी सूरत में संविधान पीठ के चार जज यदि अपनी बात की सुनवाइ उसी संविधान पीठ के एक अन्य जज जो कि मुख्य न्यायाधीष हैं द्वारा उनकी ही बात ना सुने जाने पर प्रेस के सामने आ गये तो कौन सा अपराध हो गया?
अपनी ही न्यायपालिका के जज हैं अपने ही देश में अपनी ही प्रेस के सामने आ गये तो क्या हो गया?

उन्होंने जो कहा और उस पर जो नतीजा सामने आयेगा, उससे हमारी न्यायपालिका  और अधिक न्यायिक नज़र आयेगी। उन्होंने प्रेस के सामने यह तो नहीं कहा कि संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया है, इसलिए वे प्रेस के अलावा कहॉं जाते?
मुख्य न्यायाधीष ने भी अबतक निभाई जा रही मान्य परम्पराओं का निर्वहन करते हुए अपना अधिकार समझते हुए निर्णय लिए।

अब यदि उन प्रशासनिक निर्णयों से अपनी ही पीठ के चार अन्य जज सहमत नहीं हैं तो, सर्वमान्य प्रक्रिया का प्रतिपादन हो सकता है। इसे परिवार में हुए मन-मुटाव के अलावा अन्य किसी भी तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।
मैं तो अपनी छोटी सी बुद्धि के बल पर यही कहूंगा कि ये कोई ऐसा मसला नहीं कि इसका हल ना निकले, इससे पहले रविवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष विकास सिंह ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मुलाकात की थी।
विकास सिंह ने शीर्ष न्यायपालिका में संकट को लेकर एक प्रस्ताव सौंपा था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ की बैठक होने की संभावना है, जिसमें मौजूदा संकट पर चर्चा हो सकती है।

वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने सीजेआई दीपक मिश्रा से मुलाकात करने के बाद बताया कि उन्होंने एससीबीए के प्रस्ताव की एक प्रति प्रधान न्यायाधीश को सौंपी, जिन्होंने उस पर गौर करने का आश्चासन दिया है। उनकी न्यायमूर्ति मिश्रा से करीब 15 मिनट बातचीत हुई।
सिंह ने कहा,‘मैं प्रधान न्यायाधीश से मिला और प्रस्ताव की प्रति उन्हें सौंपी। उन्होंने कहा कि वह इस पर गौर करेंगे और सुप्रीम कोर्ट में जल्द-से-जल्द सौहार्द कायम करेंगे।’

सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

Thursday, August 24, 2017

रवीन गांधी, अमरीका छोड़ो;

अन्तिम किश्त
           

सीमा से परे जाकर लेख लिखने वाले रवीन गांधी के खिलाफ परोशी जा रही नस्ली टिप्पणी/नफरत भरे संदेश वास्तव में ये सिद्ध करते हैं कि उन अमेरिकन्स में देशभक्ति  है और वे अपने देश को अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं, मान देते हैं, सम्मान देते हैं, अमेरिकन्स के लिए देश पहले है, अपना घर, सुख-चैन, बाद में, जबकि भारतीयों के लिए अपना घर पहले है, देश बाद में। इसलिए भारतीयों के लिए ऐसी घड़ी आ गई है कि, वे अपना सबकुछ बेस्ट देने के बाद भी नस्ली टिप्पणी झेलने और जूते खाने को मजबूर हैं।


कुछ टिप्पणीयों को यहां उघृत किया जाना अपरिहार्य है। जैसे कि एक महिला ने अपने वॉयस मेल में रवीन गांधी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और कहा कि अपना कूड़ा समेटो और भारत चले जाओ और अपने साथ निक्की हेली को भी लेते जाओ।


 
निक्की हेली संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की दूत हैं। उन्हें राजदूत किस उद्देश्य से बनाया गया, ये तो अमेरिका ही जाने, लेकिन इतना सत्य है कि उसने अपने फायदे के लिए ही बनाया होगा। अमेरिकन जानते हैं कि भारतीय, गुलामी मानसिकता के लोग हैं, उनके जीन्स में गुलामी कूट-कूट कर भरी है. वे किस बिना पर हमारे ही देश का खाकर-पीकर हमारे ही श्वेत राष्ट्रपति की नीतियों का विरोध कर रहे हैं।

अमेरिका में नस्ली भेदभाव की घटनाओं में इजाफा होना परिलक्षित है। यदि समय रहते भारतवंशियों ने स्वंय से अमेरिका नहीं छोड़ा तो कुछ ही दिनों में उन्हें अमेरिका को  वैसे ही छोडऩा पड़ेगा जैसे लोगो को सीरिया छोड़ना पड़ रहा  हैं। उनकी सारी पूंजी, चल/अचल सम्पत्ति वहीे रह जाएगी और भारत वापस लौटना भी उनके लिए सम्भव नहीं हो पायेगा।



किसी भी देश का प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति वही नीति बनाता है और लागू करता है, जो उसके लिए मुफीद होती है, जो उसे सत्ता में ज्यादा दिनों तक टिकाये रहने में मददगार होती है। रवीन गांधी भी अपनी कम्पनी में उसी नीति को अपनाते होंगे, जो उनके लिए मुफीद हो। वे उन कर्मचारियों के भले की नीति तो बनाते नहीं होंगे।

दूसरे उन्हीं के अधीन काम करने वाला, भले ही वह कम्पनी का प्रबन्ध निदेशक बना दिया गया हो, रवीन गांधी को ये तो कतई अच्छा नहीं लगेगा कि वो प्रबन्ध निदेशक, रवीन गांधी की नीति की कटु अलोचना करें। ऐसा करने का क्या मतलब होता है, ये रवीन गांधी को आज नहीं तो कल समझना ही होगा।


वैश्विक परिवेष में ऐसी टिप्पणीयों को निर्विकार भाव से समझना होगा, और उसी के अनुरूप टिप्पणी करनी होगी। जब भारत देश से प्यार करने वालों ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो का सफल आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों को भगा दिया तो अमेरिकन्स यदि 'अमेरिका छोड़ो का नारा बुलन्द कर रह हैं, तो कैसा और काहे का विरोध-हंगामा ।

रवीन गांधी को वॉयसमेल पर प्राप्त मैसेज को यू-टयूब, ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट करने से कोई फायदा होने वाला नहीं। ये तीनों प्लेटफार्म अमेरिकन्स के ही हैं, उस पर की जा रही पोस्टिंग, भारतीयों-अमेरिका छोड़ो के आन्दोलन को ही बढ़ावा देगी। मेरी राय में निक्की हेली, रवीन गांधी और उन जैसे हजारों लाखों भारतीयों को अपने आप अमेरिका छोड़कर भारत वापस आ जाना चाहिए, उसके लिए वे सीधे भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी से विचार-विमर्श कर सकते हैं।

अपने घर की सूखी रोटी से अच्छा, अमेरिका का जूता भरा पिज्जा, मुझे तो पसन्द नहीं, आप जैसे सौतेले अमेरिकन्स को पसन्द हो तो खाईये पिज्जा, लेकिन अपमान भरी जिन्दगी तो जीनी ही पड़ेगी, उससे कोई नहीं बचा पायेगा।

सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

ओ ‘Indians” अमरीका छोड़ो;

प्रथम किश्त
          अंग्रेजों, भारत छोड़ो की तर्ज पर आजकल अमेरिका में भी भारतवंसियों  के लिए यही तराना गूँज रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि ये भारतवंशी ना तो वहां के शासक हैं, और ना ही अमेरिकियों पर कोई जुल्म कर रहे हैं, जिससे आहत होकर अमेरिकियों को एसा करना पड़ रहा हो। अपनी बुद्धि, अपने कौशल, अपनी लगातार मेहनत करने की प्रवृत्ति (जिसका प्रदर्शन वे हिन्दुस्तान में नहीं करते) के बल पर ही वे अमेरिका/विदेश में ल्यूक्रेटिव नौकरी पाते हैं। प्रतिस्पर्धा में अमेरिकियों को पछाड़ कर ही सीईओ जैसे पद को प्राप्त कर पाते हैं। और ऐसा उन्होंने स्वंय से नहीं किया है। 
           उन्हें अच्छे/सम्मान जनक पदों पर अमेरिकियों ने ही पद-स्थापित किया है, फिर आज ऐसी स्थिति क्यों पैदा की जा रही है कि नस्लभेदी टिप्पड़ियों ने इन भारतीयों को नवाजने के साथ 'अमेरिका छोड़ो का नारा ही नहीं दिया जा रहा है, बल्कि कई भारतीयों को तो बेवजह गोली मार दी गई। इन सब कृत्यों के मूल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेशी भगाओ नीति भी है, जिसके बल पर अमेरिकन, अमेरिका में बसे भारतीयों का उत्पीडऩ कर रहे हैं, मानवधिकारों का पोषक अमेरिका केवल अमेरिकियों पर होने वाले उत्पीडऩ को ही मानवधिकारों  के हनन को तवज्जो देता है, जब वह स्वंय में किसी भारतीय, अथवा अन्य विदेशी मूल के लोगों के साथ उत्पीडऩ करता है तो मानवाधिकारों का हनन कोई मुद्दा नहीं रह जाता है।
           ताजा मसला जी0एम0एम0 नॉन स्टिक कोटिंग्स कम्पनी के संस्थापक और सीईओ रवीन गांधी के सीएनबीसी में प्रकाशित एक आलेख के  बाद शुरू हुआ है, जिसके बाद ट्रम्प के समर्थकों ने भरपूर नस्ली टिप्पणीयां करना शुरू कर दिया। दरअसल रवीन गांधी ने अपने लेख में लिखा है कि वर्जीनिया में हुई नस्ली हिंसा के बाद ट्रम्प ने अपने बयान में श्वेत श्रेष्ठतावादियों का बचाव किया है, इसलिए वे ट्रम्प के आर्थिक एजेंडे का समर्थन नहीं करेंगे। भले ही बेरोजगारी एक प्रतिशत रह जाये अथवा जीडीपी सात प्रतिशत बढ़ जाये। लेकिन वे ऐसे राष्ट्रपति का समर्थन नहीं करेंगे जो नस्ली भेदभाव को बढ़ावा देता हो और वह उन अमेरिकियों से नफरत करे जो उन जैसे नहीं दिखते हैं।
           यहां पर मैं, रवीन गांधी के स्टेटमेंट /आलेख से सहमत नहीं हूं। रवीन गांधी को समझना होगा कि वे भारत में नहीं हैं, अमेरिका में हैं। भले ही अमेरिका  ने उन्हें अमेरिकी नागरिक मान लिया हो, लेकिन हैं वे अमेरिका की सौतेली औलाद? उन्होंने आपको अमेरिकी इसलिए तो नहीं बनाया कि आप वहीं रहें, वहीं खायें, वहीं मौज करें और उसी देश के अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों पर तल्ख़ टिप्पणी करें। ऐसा रवीन गांधी ने इसलिए किया कि वे भूल गये कि वे भारत में नहीं अमेरिका में हैं। भारत में तो एक टुच्चे लेवल का व्यक्ति भारत के सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री पर ऐसी बेहुदा ओद्दी और हद दर्जे की गन्दी टिप्पणी कर देता है कि-यदि वह व्यक्ति अमेरिका में हो तो सूट कर दिया जाये, लेकिन भारत में वह लीडर हो जाता हैं, उसके साथ हजारों फिरका परस्तों की भीड़ खड़ी हो जाती हैं।

           इसीलिए रवीन गांधी जी, भले ही आप अमेरिका के लिए फायदे की चीज़ हों, लेकिन ये अधिकार आपको कागजी रूप से मिले अधिकारों में शामिल नहीं हैं। आपको अथवा किसी भी गैर अमेरिकी लोगों को अमेरिका ने ये अधिकार ना तो दिया ना ही देंगे कि आप जैसे लोग, वहां के राष्ट्रपति की नीतियों की इस तरह से भर्तस्ना करें। आप अपनी तुलना उन अमेरिकियों से नहीं कर सकते, जो आप पर नस्ली टिप्पणीयां कर रहे हैं, क्योंकि उनमें देश भक्ति है, और ऐसे राष्ट्रीय करेक्टर की छवि, किसी भी उन भारतीयों में नहीं है, जो विदेश में जा बसे हैं, और अपनी और केवल अपनी मौज-मस्ती और अपने परिवार की जिन्दगी का ही भला सोचते है।
सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)
Satish Pradhan

Tuesday, August 22, 2017

आतंकी फण्डिंग का हाल्ट लखनऊ तो नहीं?

राष्ट्रीय जांच ऐजेन्सी (एन.आई.ए) को आतंकी फण्डिंग पर संभावनाओं की तलाश के लिए लखनऊ को भी निशाने पर रखना चाहिए। लखनऊ का एक शक्स काफी वर्षों से इसका इनपुट दे रहा है, लेकिन उसकी जानकारी पर अहम ऐजेन्सियां मौन साधे बैठी हैं, क्यों, ये तो वही जानें, लेकिन कश्मीर में की जा रही फंण्डिंग और उत्तर प्रदेश में हुए आतंकी धमाकों में कहीं कोई कनेक्शन तो नहीं, इस पर जांच-पड़ताल और कड़ी नज़र की जरूरत है।

फण्डिंग के नेटवर्क का पता तो तभी चलेगा, जब उस पर हल्के से इनपुट पर ही आप उसे अपने स्कैनर पर रखेंगे। एन०आई०ए० ने कश्मीर में मारे गये छापे में विदेश से फंण्डिंग आने और उन्हे लोकल स्तर पर वितरित करने की रसीदें जब्त की।

कश्मीर का नामी-गिरामी व्यापारी जद्दूर वटाली अपने देश-विदेश में फैले व्यापारिक संस्थानों के माध्यम से आतंकी फण्डिंग का व्यापार चला रहा था। आश्चर्य की बात यह है कि एन०आई०ए० ने जिन बारह स्थानों पर छापेमारी की वे सभी जद्दूर वटाली के हैं। यहां बताना आवश्यक है कि एन०आई०ए, आतंकी फण्डिंग के मामले में हुर्रियत के सात नेताओं को पूर्व में ही यहां से गिरफ्तार कर चुकी है।
एन०आई०ए० पिछले ढ़ाई महीने में 25 से भी अधिक बार जद्दूर वटाली से पूछ-ताछ कर चुकी है तथा वटाली के गुडग़ांव स्थित कार्यालय पर छापा भी मार चुकी है। बावजूद इसके जद्दूर वटाली ने एन०आई०ए को कुछ भी नहीं बताया, काफी ढ़ीठ किस्म का व्यापारी निकला।

आखिरकार एन०आई०ए० ने वटाली की आतंकी फण्डिंग में लिफ्त होने की ठोस सूचना एकत्र करने के बाद उसके रिश्तेदारों के यहॉ छापे मारने की कार्ययोजना बनाई, और उसी के तहत, बारह स्थानों पर छापेमारी की, जिसमें वटाली के करीबी रिश्तेदार और एक ड्राइवर शामिल है। छापे में बरामद दस्तावेज के बारे में एन०आई०ए ने कोई खुलासा नहीं किया है, और करना भी नहीं चाहिए। वैसे एन०आई०ए ने आतंकी फण्डिंग से जुड़े सुबूत बरामद किये जाने का दावा जरूर किया है।
उपरोक्त के सन्दर्भ में आपको बता दें कि यू०पी० ए०टी०एस० बांग्ला और अरबी जानने वालों के जरिए फैजान के यहां से मिले दस्तावेजों का अनुवाद करवा रही है।

सतीश प्रधान

(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

Monday, August 21, 2017

Blue Whale से सौगुना ज्यादा खतरनाक लव जि़हाद


भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा एक मामला तब आया जब केरल हाईकार्ट ने एक पिता की रिट पर उसकी पुत्री के धर्म परिवर्तन करने के पश्चात मुस्लिम व्यक्ति शफी जहॉ से शादी कर ली। पिता की रिट पर केरल High Court ने विवाह को रद्द कर दीया, जिसके खिलाफ मुस्लिम युवक शाफी Supreme Court पहुंच गया।
पिता के बयान को Supreme Court ने गंभीरता से लिया और उसे लव जि़हाद के आईने में देखते हुए चीफ जस्टिस जे०एस० खेहर ने कहा कि-केरल में लव जि़हाद के मामले वाकई चिंता का विषय हैं। हम चाहते हैं कि उसकी गहनता से विवेचना हो, जिसके लिए एन०आई०ए० एक उपर्युक्त संस्था है। चीफ जस्टिस ने कहा कि जाँच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आर०वी०रवीन्द्रन करेंगे, जिससे किसी तरह की गफलत ना हो।
ब्लूव्हेल, इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का जानलेवा गेम है। इस प्राणघातक गेम के कारण देश के कुछ बच्चों ने आत्महत्या की है। भारत के कानून एवंं आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सभी तकनीकी मंचों को यह दिशा-निर्देश दिये जाते हैं कि वे तात्कालिक प्रभाव से इस लिंक को डीलिंक कर दें। ज्ञात हो यह गेम ५० दिनों की अवधि में खिलाडिय़ों को कुछ टास्क देता है, और इसका अंतिम टास्क आत्महत्या करना होता है। खिलाड़ी से हर टास्क के बाद उसको ऑनलाइन फोटो भी शेयर करने के निर्देश होते हैं। विदेश में ऐसी कई हत्याओं के बाद अब भारत के मुम्बई और पश्चिम मिदनापुर जिले में भी ऐसी आत्महत्याओं की पुस्टि हुई है। ऐसी हत्याओं के आंकड़े अभी हजार से नीचे ही हैं, फिर भी यह घनघोर चिंता का विषय है, जबकि लवजि़हाद के मामले में आत्महत्याओं का आंकड़ा दस हजार के भी पार हो गया है।

ब्लूव्हेल इंटरनेट पर खेला जा रहा है, लेकिन लवजि़हाद तो हमारी आम जिन्दगी के बीच खेला जा रहा है। हमारे सुप्रीम कोर्ट को भी आखिरकार यह मानने पर मजबूर होना पड़ा है कि लव जि़हाद भी व्लूव्हेल गेम की ही तरह है। दोनों में ही एक लक्ष्य तय करके काम किया जाता है।
लवजि़हाद में अबतक दस हजार से भी अधिक हिन्दू, ईसाई एवं सिख लड़कियों को उकसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया, और फिर मिशन पर लगा दिया गया। मिशन पूंर्ण होने से पूर्व ही केरल की एक हिन्दू लड़की के मुस्लिम युवक शाफी के साथ किये गये विवाह को लड़की के पिता की हाईकोर्ट में गुहार के बाद रद्द कर दिया गया।

इस विवाह रद्दीकरण के पश्चात मुस्लिम लड़का सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने एन० आई० ए० से जाचं के आदेश करते हुये, कहा कि जाचं की निगरानी सेवानिवृत्त जस्टिस के० एस० राधाकृष्णन करेगें, लेकिन मुस्लिम युवक शफी जहॉ के वकील कपिल सिब्बल ने आपत्ति जताई कि केरल मूल के किसी सेवानिवृत्त अधिकारी को मामले में जोडऩा ठीक नहीं होगा। इसके बाद चीफ जस्टिस ने रवीन्द्रन का नाम तय कर दिया।
सिब्बल का कहना था कि पीडि़त महिला से भी अदालत को बात करनी चाहिए। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि अभी ये ठीक नहीं होगा। पहले एनआईए अपनी जांच पूरी करले, तब उनकी पीठ सभी जांच रिर्पोटों पर गौर करेगी। उसके पश्चात ही महिला को सुनना बेहतर होगा।

सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

Tuesday, August 15, 2017

मुफ्त मुफ्त का खाके महबूबा गईं पगलाय

         हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों के खून पसीने की कमाई खा-खा कर महबूबा मुफ्ती पागलों की तरह बर्ताव करने लगी हैं। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के देशद्रोही बोलअगर संविधान के अनुच्छेद 370 और 35- से छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। वो शायद भूल रही हैं कि तिरंगा वो झंडा है जो उनकी मृत्यु पर उनको भी नसीब नहीं होगा। उनको पता नहीं कि तिरंगा नसीब वाले लोगों को ही नसीब होता है,किसी ऐरे गैरे को नहीं।और महबूबा मुफ्ती इसी कैटेगरी मैं आती हैं।     
         जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का एक फलसफिया बयान है किआप किसी विचार को कैद नहीं कर सकते। आप किसी विचार को मार नहीं सकते।इसका अहसास उन्हें शायद तब हुआ जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए हुर्रियत के सात लोगों को गिरफ्तार कर दिल्ली ले आई और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में आतंकियों के  मारे जाने का सिलसिला तेज हो गया। एनआइए की कार्रवाई से ठीक एक दिन पहले 28 जुलाई को नई दिल्ली की एक संगोष्ठी में उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था, गौरतलब है कि इससे पहले 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 35- को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ का गठन किया गया था। नए राष्ट्रपति के शपथ ग्र्रहण समारोह में शिरकत करने के तुरंत बाद महबूबा ने आतंकियों के कृत्यों को जस्टिफाय करने के लिए उक्त विचार रखे। आखिर ऐसा क्यों है कि जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती देशद्रोही बयान देने के बावजूद अपने पद पर काबिज हैं? सवाल यह भी है कि उनको  सत्ता में बनाये रखना  भाजपा की कौन सी मजबूरी है कि वह उन्हें ढोये चले जा रही है? भले ही महबूबा के करतब  नए हों, लेकिन ऐसे तुर्रे छेड़ने की उनकी आदत खासी पुरानी है।
          इसी साल 17 मार्च को महबूबा ने कहा था कि राज्य के कुछ हिस्सों से अफस्पा कानून को हटा देना चाहिए। उन्होंने यह बयान तब दिया था जब सुरक्षा बलों की आतंकियों से मुठभेड़ आम हो चली थी। इन मुठभेड़ों के दौरान सुरक्षा बलों पर पत्थरबाज छोड़ दिए जाते थे। अब तो जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती विदेश नीति में भी खासी दिलचस्पी दिखा रही हैं। 18 मार्च को मुंबई में मोदी सरकार को एक बिन मांगी सलाह देते हुए उन्होंने कहा था कि भारत को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी से जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि इससे कश्मीर का मध्य एशिया के साथ जुड़ाव काफी फायदेमंद साबित होगा। उन्होंने ऐसा कहने से पहले इस परियोजना के विरोध में भारत सरकार की उस घोषित नीति का भी लिहाज नहीं किया जिसके तहत उसे गुलाम कश्मीर में चीन के दखल को औपचारिक और स्थाई बताते हुए खारिज किया गया था। मुख्य विपक्षी-दल कांग्रेस तो छोड़िए, अमूमन चीन की ओर झुकाव रखने वाले वामपंथी भी ऐसा कहने का दुस्साहस नहीं करते, लेकिन भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहीं महबूबा आए दिन उसे मुंह चिढ़ाते हुए लक्ष्मण रेखा लांघ रही हैं और भाजपाई मजबूरन धृतराष्ट्रवादी बनने को मजबूर हैं। 
          
          अगर भाजपा की विवशता को समझना है तो उस समझौते को देखना होगा जिसके आधार पर दोनों दलों का गठजोड़ टिका है। जिन शर्तों पर यह सरकार बनी है उससे यही लगता है कि भाजपा ने पीडीपी के समक्ष समर्पण कर रखा है। समझौते की एक शर्त यह है कि भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे सहित सभी कानूनों को यथावत रखा जाएगा। तीन साल तक सुप्रीम कोर्ट में जवाब टालते हुए केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 35- पर अपना पक्ष रखने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कियह अति संवेदनशील मामला है।दूसरी ओर महबूबा 35- को लेकर बेचैन क्या पागल सी दिख रही हैं।
          इस मामले में दौड़ते दौड़ते उन्होंने फारूख अब्दुल्ला से भी मुलाकात कर डाली। गठबंधन की शर्तों में यह भी शामिल है कि केंद्र सरकार कश्मीर में हालात की पुन: समीक्षा कर उसे अपीड़ित क्षेत्र घोषित कर अफस्पा की आवश्यकता पर पुनर्विचार करे।राजनीतिक पहलके तहत पाकिस्तान से बातचीत शुरू करना और रिश्ते सुधारने की भी बात है। लगता है कि यही वजह रही कि भारत ने पाकिस्तान के साथ अपनी ओर से जो वार्ता बंद की उसी को प्रधानमंत्री ने अपमान का घूंट पीकर 23 फरवरी, 2015 को स्वयं शुरू किया।
आज कोई और नहीं, बल्कि महबूबा ही पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के लिए लगातार दबाव बना रही हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने सरकार की इतनी फजीहत की हो, जितनी महबूबा करती रही हैं। 
          बहरहाल इसके लिए महबूबा और उनकी पार्टी पीडीपी की पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है। महबूबा के पिता और पार्टी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद खानदानी मुफ्ती यानीमजहबी कानूनके ज्ञाता थे। उन्होंने कांग्र्रेस के साथ अपने सियासी सफर का आगाज किया फिर नेशनल कांफ्रेंस की लोकप्रियता का मुकाबला करने के लिए उन्हें जमात--इस्लामी के नेतृत्व और संगठन की शरण में जाना पड़ा। वहीं अलगाववाद के झंडाबरदार और हुर्रियत के सरगना सैयद अली शाह गिलानी(आतंकियों का साथ देने वाला देश का गद्दार नेता) के साथ उनके रिश्तों की बुनियाद पड़ी। कांग्र्रेस की राजनीति करते हुए भी उनकी जहनियत पर इस्लाम का ही ज्यादा असर रहा।
          धयान रहे कि 1990 के विस्थापन से पहले घाटी के हिंदू समुदाय ने 1986 में अनंतनाग के दंगों की विभीषिका झेली थी। उसमें हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कतलेआम किया गया तथा जान-माल का नुकसान हुआ था। 40 से अधिक मंदिरों को लूटखसोट कर आग के हवाले कर दिया गया था। मुफ्ती के गृहनगर का यह तांडव मुफ्ती मोहम्मद सईद की शह पर ही हुआ था।
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          राज्य विधानसभा चुनाव के बाद महबूबा मुफ़्ती दिल्ली में थीं। एक मीडिया संस्थान के कार्यक्रम में उनसे जब पूछा गया कि चुनाव नतीजे 23 दिसंबर को ही गए तो नई सरकार के शपथ ग्र्रहण में एक मार्च तक की देरी क्यों हो गई? तब महबूबा के मुंह से अनायास ही निकल आया कि हुर्रियत को मनाने में हफ्तों निकल गए। इससे जाहिर होता है कि उनके पिता ने शपथ लेते ही सबसे पहले हुर्रियत और पाकिस्तान को धन्यवाद क्यों दिया और वह भी प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में। 
          यह भी समझ आता है कि गठबंधन की शर्तों में पाकिस्तान के साथ बातचीत की शर्तों पर इतना जोर क्यों है और इस पर भाजपा ने घुटने क्यों टेके? यह वही महबूबा हैं जिन्होंने 2008 में कांग्रेस के साथ अपनी ही गठबंधन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। तब उन्हें श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन पर कड़ा एतराज था। जमीन 16 हजार फीट ऊंचाई पर यात्रियों के प्राथमिक उपचार और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए आवंटित की गई थी जिनके अभाव में कई वर्षों से तीर्थयात्रियों की मौत हो रही थी। 
          विरोध के पीछे उनकी दलील थी कि यह कश्मीर का जनसंख्या अनुपात बदलने की साजिश है, जबकि इतनी ऊंचाई पर आम इंसानी बसावट कोई आसान बात नहीं है। यह भूमि भी अस्थाई निर्माण के लिए थी। जब राज्यपाल ने असहमति जताई तो राज्यपाल को ही बदल दिया गया और आवंटन रद कराया गया। वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के एक कार्यक्रम में तत्कालीन रॉ प्रमुख एएस दुलत ने मंच पर महबूबा को जगह भी नहीं दी थी। इसके पीछे वजह यही बताई गई कि भारतीय गुप्तचर एजेंसियों ने महबूबा की हिजबुल कमांडरों से नजदीकियां ताड़ ली थीं। 
          अब उन्हीं महबूबा को यह मुगालता हो गया है कि कश्मीर में तिरंगा उनके हाथों का मोहताज बन गया है। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को पता नहीं कि तिरंगे की मोहताज़ मुफ़्ती हो सकती हैं तिरंगा नहीं  अच्छा होता कि भाजपा उनसे यह कहे कि कश्मीर में तिरंगा उनसे पहले भी फहरता रहा है और उनके बाद भी बदस्तूर लहराता रहेगा।
सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)